मत कहो आकाश में कोहरा घना हैये किसी की वयक्तिगत आलोचना हैसुर्या हमने भी नही देखा सुबह सेक्या करोगे, सुर्या को क्या देखना हैरक्त वर्षों से नसों में खौलता हैआप कहते हैं क्षनिक उत्तेजना हैदोस्तों! अब मन्च पर सुविधा नहीं हैआजकल नेपथ्य में सँभावना हैहो गयी है पीर परवत सी, पिघलनी चाहियेइस हिमालया से कोई गंगा निकलनी चाहियेआज ये दीवार परदों की तरह हिलने लगीशर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिये हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव मेंहाथ लेहराते हुए, हर लाश चलनी चाहियेसिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहींमेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहियेमेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सहीहो कहिं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिये
-दुष्यंत कुमार
आभार
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